महान प्राचीन भारत के बारे में कुछ ऐसे तथ्य और जानकारियां जिन्हे जानकर आप हैरान रह जाएंगे।
16 सित॰ 2013
क्या कहते है क,ख,ग ??
ख- खराब मत करो
ग- गर्व ना करो
घ- घमणड मत करो
च- चिँता मत करो
छ- छल-कपट मत करो
ज- जवाबदारी निभाओ
झ- झुठ मत बोलो
ट- टिप्पणी मत करो
ठ- ठगाई मत करो
ड- डरपोक मत बनो
ढ- ढोँग ना करो
त- तुच्छवारा मत करो
थ- थको मत
द- दिलदार बनो
ध- धोखा मत करो
न- नम्र बनो
प- पाप मत करो
फ- फालतु काम मत करो
ब- बिगाड मत करो
भ- भावुक बनो
म- मधुर बनो
य- यश्वी बनो
र- रोओ मत
ल- लोभ मत करो
व- वेर मत करो
श- शत्रुता मत करो
ष- षटकोण की तरह स्थिर रहो
स- सच बोलो
ह- हँसमुख रहो
क्ष- क्षमा करो
त्र- त्रास मत करो
ज्ञ- ज्ञानी बनो !!
11 अग॰ 2013
आचार्य चाणक्य: एक देश निर्माता
वर्तमान दौर की सामाजिक संरचना, भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था और शासन-प्रशासन को सुचारू ढंग से बताई गई नीतियाँ और सूत्र अत्यधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं।
चाणक्य नीति के दुसरे अध्याय से यहाँ प्रस्तुत हैं कुछ अंश -
1. जिस प्रकार सभी पर्वतों पर मणि नहीं मिलती, सभी हाथियों के मस्तक में मोती उत्पन्न नहीं होता, सभी वनों में चंदन का वृक्ष नहीं होता, उसी प्रकार सज्जन पुरुष सभी जगहों पर नहीं मिलते हैं।
2. झूठ बोलना, उतावलापन दिखाना, दुस्साहस करना, छल-कपट करना, मूर्खतापूर्ण कार्य करना, लोभ करना, अपवित्रता और निर्दयता - ये सभी स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं। चाणक्य उपर्युक्त दोषों को स्त्रियों का स्वाभाविक गुण मानते हैं। हालाँकि वर्तमान दौर की शिक्षित स्त्रियों में इन दोषों का होना सही नहीं कहा जा सकता है।
3. भोजन के लिए अच्छे पदार्थों का उपलब्ध होना, उन्हें पचाने की शक्ति का होना, सुंदर स्त्री के साथ संसर्ग के लिए कामशक्ति का होना, प्रचुर धन के साथ-साथ धन देने की इच्छा होना। ये सभी सुख मनुष्य को बहुत कठिनता से प्राप्त होते हैं।
4. चाणक्य कहते हैं कि जिस व्यक्ति का पुत्र उसके नियंत्रण में रहता है, जिसकी पत्नी आज्ञा के अनुसार आचरण करती है और जो व्यक्ति अपने कमाए धन से पूरी तरह संतुष्ट रहता है। ऐसे मनुष्य के लिए यह संसार ही स्वर्ग के समान है।
5. चाणक्य का मानना है कि वही गृहस्थी सुखी है, जिसकी संतान उनकी आज्ञा का पालन करती है। पिता का भी कर्तव्य है कि वह पुत्रों का पालन-पोषण अच्छी तरह से करे। इसी प्रकार ऐसे व्यक्ति को मित्र नहीं कहा जा सकता है, जिस पर विश्वास नहीं किया जा सके और ऐसी पत्नी व्यर्थ है जिससे किसी प्रकार का सुख प्राप्त न हो।
6. जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपड़ी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य को बिगाड़ देता हो, उसे त्याग देने में ही भलाई है। चाणक्य कहते हैं कि वह उस बर्तन के समान है, जिसके ऊपर के हिस्से में दूध लगा है परंतु अंदर विष भरा हुआ होता है।
7. चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति अच्छा मित्र नहीं है उस पर तो विश्वास नहीं करना चाहिए, परंतु इसके साथ ही अच्छे मित्र के संबंद में भी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है। अत: सावधानी अत्यंत आवश्यक है।
8. चाणक्य का मानना है कि व्यक्ति को कभी अपने मन का भेद नहीं खोलना चाहिए। उसे जो भी कार्य करना है, उसे अपने मन में रखे और पूरी तन्मयता के साथ समय आने पर उसे पूरा करना चाहिए।
9. चाणक्य का कहना है कि मूर्खता के समान यौवन भी दुखदायी होता है क्योंकि जवानी में व्यक्ति कामवासना के आवेग में कोई भी मूर्खतापूर्ण कार्य कर सकता है। परंतु इनसे भी अधिक कष्टदायक है दूसरों पर आश्रित रहना।
10. चाणक्य कहते हैं कि बचपन में संतान को जैसी शिक्षा दी जाती है, उनका विकास उसी प्रकार होता है। इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे उन्हें ऐसे मार्ग पर चलाएँ, जिससे उनमें उत्तम चरित्र का विकास हो क्योंकि गुणी व्यक्तियों से ही कुल की शोभा बढ़ती है।
11. वे माता-पिता अपने बच्चों के लिए शत्रु के समान हैं, जिन्होंने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दी। क्योंकि अनपढ़ बालक का विद्वानों के समूह में उसी प्रकार अपमान होता है जैसे हंसों के झुंड में बगुले की स्थिति होती है। शिक्षा विहीन मनुष्य बिना पूँछ के जानवर जैसा होता है, इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों को ऐसी शिक्षा दें जिससे वे समाज को सुशोभित करें।
12. चाणक्य कहते हैं कि अधिक लाड़ प्यार करने से बच्चों में अनेक दोष उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए यदि वे कोई गलत काम करते हैं तो उसे नजरअंदाज करके लाड़-प्यार करना उचित नहीं है। बच्चे को डाँटना भी आवश्यक है।
13. शिक्षा और अध्ययन की महत्ता बताते हुए चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य का जन्म बहुत सौभाग्य से मिलता है, इसलिए हमें अपने अधिकाधिक समय का वेदादि शास्त्रों के अध्ययन में तथा दान जैसे अच्छे कार्यों में ही सदुपयोग करना चाहिए।
14. जिस प्रकार पत्नी के वियोग का दुख, अपने भाई-बंधुओं से प्राप्त अपमान का दुख असहनीय होता है, उसी प्रकार कर्ज से दबा व्यक्ति भी हर समय दुखी रहता है। दुष्ट राजा की सेवा में रहने वाला नौकर भी दुखी रहता है। निर्धनता का अभिशाप भी मनुष्य कभी नहीं भुला पाता। इनसे व्यक्ति की आत्मा अंदर ही अंदर जलती रहती है।
15. चाणक्य के अनुसार नदी के किनारे स्थित वृक्षों का जीवन अनिश्चित होता है, क्योंकि नदियाँ बाढ़ के समय अपने किनारे के पेड़ों को उजाड़ देती हैं। इसी प्रकार दूसरे के घरों में रहने वाली स्त्री भी किसी समय पतन के मार्ग पर जा सकती है। इसी तरह जिस राजा के पास अच्छी सलाह देने वाले मंत्री नहीं होते, वह भी बहुत समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता। इसमें जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए।
16. ब्राह्मणों का बल विद्या है, राजाओं का बल उनकी सेना है, वैश्यों का बल उनका धन है और शूद्रों का बल दूसरों की सेवा करना है। ब्राह्मणों का कर्तव्य है कि वे विद्या ग्रहण करें। राजा का कर्तव्य है कि वे सैनिकों द्वारा अपने बल को बढ़ाते रहें। वैश्यों का कर्तव्य है कि वे व्यापार द्वारा धन बढ़ाएँ, शूद्रों का कर्तव्य श्रेष्ठ लोगों की सेवा करना है।
17. चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह वेश्या धन के समाप्त होने पर पुरुष से मुँह मोड़ लेती है। उसी तरह जब राजा शक्तिहीन हो जाता है तो प्रजा उसका साथ छोड़ देती है। इसी प्रकार वृक्षों पर रहने वाले पक्षी भी तभी तक किसी वृक्ष पर बसेरा रखते हैं, जब तक वहाँ से उन्हें फल प्राप्त होते रहते हैं। अतिथि का जब पूरा स्वागत-सत्कार कर दिया जाता है तो वह भी उस घर को छोड़ देता है।
18. बुरे चरित्र वाले, अकारण दूसरों को हानि पहुँचाने वाले तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले व्यक्ति के साथ जो पुरुष मित्रता करता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। आचार्य चाणक्य का कहना है मनुष्य को कुसंगति से बचना चाहिए। वे कहते हैं कि मनुष्य की भलाई इसी में है कि वह जितनी जल्दी हो सके, दुष्ट व्यक्ति का साथ छोड़ दे।
19. चाणक्य कहते हैं कि मित्रता, बराबरी वाले व्यक्तियों में ही करना ठीक रहता है। सरकारी नौकरी सर्वोत्तम होती है और अच्छे व्यापार के लिए व्यवहारकुशल होना आवश्यक है। इसी तरह सुंदर व सुशील स्त्री घर में ही शोभा देती है।
_____________ "एक भारतीय"
14 जन॰ 2013
हमारे सेना प्रमुख
हमारे सेना प्रमुख का बयान "अगर पाक ने अपना रवैया नही बदला तो भारत आक्रामक कार्यवाही करेगा|"
हा हा हा,
ही ही ही,
हो हो हो|
ये मजाक अच्छा नही है सेना प्रमुख जी| जरा ये तो बताओ कि रोका किसने है, और साले किस माई के लाल में दम है जो भारतीय सेना को रोक ले?
हाँ, अगर आप ये दलील देना चाहते हो कि मंदमोहन की, प्रोणव की, आउल बाबा की, माइनो की इजाजत के बिना आप कुछ नही करोगे तो "थू" है आप पर|
या फिर आप ये कहो कि भारत ने आजतक किसी भी देश पर पहले हमला नही किया है और हम इस इतिहास को नही बदलेंगे तो आप की जानकारी के लिये बता दूं कि सिर्फ सेना लेकर मिसाइल, बम के साथ हमला नही किया जाता| हमला तो कई तरीको से, कई मोर्चो पर किया जाता है|
जैसे पोर्किस्तान कर रहा है --
१) आतंकवादी भेजकर|
२) भारत के साथ व्यापार करने की आड में अपने धन को बढाकर और अपने एजेंट भारत में भेजकर|
३) सीमा पर इस तरह की घटनाओं को अंजाम देकर, जिस पर भारत सरकार सिर्फ अपना विरोध दर्ज करा रही है और सेना कुछ नही कर रही है, बल्कि दुश्मन से प्रार्थना कर रही है कि हमारे सैनिको के सिर हमें वापस लौटा दो|
इससे और कुछ नही होगा बल्कि भारतीय सैनिको का मनोबल गिरेगा कि हम देश के लिये जान तक दे देते है और हमारी लाशो पर राजनीति की जाती है|
जबकि सेना और भारत सरकार को चाहिए कि ऐसी किसी घटना के होते ही तुरंत हमला बोले -"शब्दो से नही बल्कि हथियारो से"| जैसा इजरायल ने फलिस्तीन के साथ किया, या फिर कथित चौधरी अमेरिका ने इराक और अफगानिस्तान के साथ किया|
अगर सरकार और सेना ने इसी तरह का रवैया अपनाए रखा तो वो दिन दूर नही जब पाक या चीन हम पर आक्रमण करेगा और हमारी सेना में फैला असंतोष हमारी हार का कारण बनेगा और इस देश के और ज्यादा टुकडे हो जायेंगे|
23 दिस॰ 2012
सरकार और पुलिस की दमनकारी नीतियां
यह आज सिद्ध हो गया है कि भारतीय पुलिस की स्थापना "गोरे अंग्रेजो" ने जिस काम के लिये की थी, उस काम का निर्वाह वो "काले अंग्रेजो" के लिये बखुबी कर रही है|
दोस्तो पुलिस की स्थापना की गयी थी भारतीयो के दमन के लिये, और यह पुनीत कार्य किया था गोरे अंग्रेजो ने सन् 1860-61 में|
पुलिस को उस समय एक विशेष अधिकार दिया गया था "Right to Offense" मतलब पुलिस जब चाहे जिसे चाहे मार सकती है, लाठी से, जूतो से, थप्पड से, और किसी भी हथियार से और वो भी बिना कारण, जबकि भारत के नागरिको को नहीं दिया गया "Right to Defense" मतलब कि अगर आपको कोई पुलिस वाला बिना किसी जायज वजह के मार रहा है तो आप अपना बचाव करने के लिये कुछ नहीं कर सकते, आपको मार खानी पडेगी|
और अगर यदि आपने गलती से भी किसी पुलिस वाले का हाथ पकड लिया या उसे पलट के मारा या अपने बचाव के लिये कुछ किया तो आप पर court case चलेगा कि आपने एक पुलिस वाले को उसका काम (duty) करने से रोका तथा आपको इसके लिये सजा भी मिलेगी|
आजादी के बाद इस देश के नेताओं (काले अंग्रेजो) ने पुलिस के लिये ये प्रचारित करवा दिया कि पुलिस तो आम जनता की सुरक्षा और सेवा के लिये है जो सरासर झूठ है| आज भी पुलिस वही काम कर रही है जो वो अंग्रेजो के लिये करती थी तथा आज भी उसके पास Right to offense है जबकि हमारे पास Right to defense नही है|
कल और आज शान्तिपूर्वक आंदोलन कर रहे छात्रो- छात्राओ, और नागरिको पर पुलिस ने वेवजह लाठियां चलाई, भरी सर्दी में पानी की बौछारे करी, आंसू गैस के गोले छोडे, और ऊपर से जुमला यह कि हमें शान्तिपूर्वक आंदोलन से कोई दिक्कत नहीं है, आप लोग हिंसा ना करें| ये तो वही बात हो गयी कि "उल्टा चोर कोतवाल को डांटे" बस फर्क सिर्फ इतना है कि यहां चोर खुद पुलिस है|
दिल्ली में छात्राओ और औरतो पर "लाठी चलाओ" कार्यवाही में एक भी महिला पुलिस नही, पुरुष पुलिस ही महिलाओ को मार रही है| अरे भाई ये तो कानून के खिलाफ है | महिलाओ पर सिर्फ महिला पुलिस ही कार्यवाही कर सकती है|
और अभी-अभी प्राप्त खबर के अनुसार दिल्ली सरकार ने गृह मंत्रालय को चिठ्ठी लिखकर कहा है कि पुलिस की कार्यवाही के बारे में उन्हे कोई जानकारी नहीं है|
हा.. हा.. हा..
कितना बडा मजाक है? पुलिस की इतनी हिम्मत कि अपने आका के हुक्म के बगैर कोई कार्यवाही करे|
सुषमा स्वराज जी ने tweet किया कि
"Please do not resort to violence. That is not the solution. It is our country. This is our problem. We will definitely find a solution. "
अरे मेडम जी यह तो बताओ कि आप किसकी तरफ हो??
मार पुलिस रही है दो दिनो से और अगर गुस्से में एक- आध लोगो ने अगर पत्थर फेक भी दिये पुलिस पर तो आप tweet करने आ गयी| कल कहां थी आप जब पुलिस ने दिनभर में 7 बार लाठियां चलाई|
और अभी तक एक भी केन्द्रीय स्तर का नेता क्यों नही आया आंदोलनकारियों से बात करने|क्यों नहीं अभी तक पुलिस को आदेश दिये गये कि आंदोलनकारियों पर कोई कार्यवाही नहीं करें|
"ये public है सब जानती है . .. " कि सब मिले हुए है, एक ही थैली के चट्टे-बट्टे है सब|
_____________ "एक भारतीय"
दिल्ली में हुआ बदलाव की क्रान्ति का आगाज (भाग -२)
ऐसा हमारे शास्त्रों में कहा गया है, और साथ में यह भी कहा गया है कि जहां नारियों का सम्मान नहीं होता और जिस समाज में, देश में वो सुरक्षित नहीं है, उसका पतन निश्चित है|और मुझे लग रहा है कि हम पतन की ओर अग्रसर है||
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जिस देश की सभ्यता और संस्कृति पर हम आज तक गर्व करते आये है, और सीना ठोककर यह कहते आये कि
आज उसी देश की नाक काट दी (इज्जत लूट ली) इन कमीनो ने, जब लोग इंसाफ की मांग लेकर पंहुचे राजधानी||
ना तो 'महामहिम' राष्ट्रपति, ना ही इस देश का सबसे ताकतवर व्यक्ति (हमारे संविधान के अनुसार) हमारे 'प्यारे' प्रधानमंत्री महोदय ने दर्शन दिये, ना ही कोई बयान आया| बस छुप के बैठ गये अपने-अपने घरोंदो में, क्योंकि पता है उन्हें कि वो तो सिर्फ कठपुतली है, किसी और के हाथों की||
और कठपुतली चलानेवाली रात को आकर कहती है कि हम कुछ करेंगे, और सोचेंगे| कल सुबह आकर मुझसे मिलो||
हा..... .हा....... हा.... क्या मजाक है|
जबकि अभी कुछ समय पहले जब ये खुद हरियाणा गयी थी तब इनका ही ये बयान था कि 'बलात्कार' तो सारे देश में होते है, उसमें हम कुछ नहीं कर सकते| और इस पर जब बाबा रामदेव ने कहा कि अगर यह तुम्हारे साथ हो जाये तो खांग्रेस समर्थको ने काफी हंगामा किया था|| और आज बात करती है कि हम कुछ करेंगे, कडा कानून बनायेंगे, बहुत बडा मजाक है ये मेरे दोस्तो...........
एक तरफ सपा की श्रीमति जया बच्चन रोती है, उस लडकी से हमदर्दी दिखाती है| और दूसरी तरफ उनकी पार्टी के "श्री" राजा भैया कहते कि "आज के युवाओं को TV पे आने का शौक है, इसलिये ये सब कर रहे है" और तो और यह भी कहते है कि "ऐसी घटनायें तो देश में रोज होती है, तब तो कोई आंदोलन नहीं करता| किसी गरीब की लडकी के साथ ऐसा होता है तो कोई हंगामा नहीं करता|"
अब मुझे एक बात बताओ कि देर से ही सही अगर लोग जाग गये है, तो तेरी .. . का क्या जाता है??
अगर हम अब एक नया कठोर कानून चाहते है, तो तेरी इतनी क्यों जल रही है??
मैं बताऊं "क्यों जल रही है", क्योंकि अगर ऐसा कोई कानून बना तो सबसे पहले ये ही फंसेगा|
तो सारांश यह है कि अब हमें एक नये नेतृत्व की जरूरत है, जो वक्त आने पर मुंह छिपाये नहीं, बल्कि जनता के साथ खडा हो|
जय भारत, जय हिन्द||
_____________ "एक भारतीय"
22 दिस॰ 2012
दिल्ली में हुआ बदलाव की क्रान्ति का आगाज
इस देश में जब भी कोई आंदोलन होता है, तो वो अहिंसापूर्वक ही शुरु होता है, लेकिन हमारे देश के महान ( कमीने ) जनप्रतिनिधी उसे एक हिंसापूर्ण आंदोलन में बदल देते है, अपनी इन ओछी हरकतो से |
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और फिर मीडिया के सामने आ जाते है भौंकने के लिये कि हमारी प्रदर्शनकारियो से अपील है कि शंतिपूर्वक आंदोलन करें|
और कभी-कभी तो हद ही कर देते है यह कहकर कि हिंसा से कुछ प्राप्त नहीं होता, यह देश और हम गांधी जी के सिद्धांतो को मानने वाले है और हमें उनका अनुसरण करना चाहिए|
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लेकिन आज जो कुछ भी हो रहा है, दिल्ली में उसने यह साबित कर दिया है कि लातो के भूत कभी बातो से नहीं मानते| जो उस देश की बेटी के साथ हुआ, अगर वो इन कमीनो की लडकी के साथ हौ जाता तो तुरंत कठोर कानून पारित करवा लेते, अध्यादेश जारी करके|
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FDI पर अध्यादेश जारी करके bill पास करवा सकते है तो लज्जाभंग के लिये कानून पारित करने के लिये अगले सत्र का इंतजार क्यों??????
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आज दिल्ली में एकत्र हुए लोग जिनमें ज्यादातर विद्यार्थी है, किसी राजनैतिक पार्टी से नहीं है, उन सभी को पैसा देकर या किसी व्यक्ति ने आव्हान कर नहीं बुलाया है, बल्कि वो सभी एकत्र हुए है, SMS, PHONE, और social networking के जरिए||
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और यही है भारत की वो असली जनता जिसे ये सफेद खादी धारण करने वाले और काले मन (दिल, दिमाग) वाले नेता भारत का भविष्य कहते है, और आज जब ये भविष्य अपने खुद के भविष्य के लिये उनसे जबाब मांगने और कठोर कानून की बात करने दिल्ली पहुंचा तो हवा टाइट हो गयी सभी. . . की||
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एक भी नेता नजर नही आया, कि चलो बात तो सुन ले कि क्या कहना चाहता है इस "भारत" का भविष्य?? आता भी कैसे, एक भी राजनैतिक दल ऐसा नहीं है जिसमें अपराधी ना हो, अपराध भी कैसे-कैसे (लज्जाभंग, कत्ल, गबन, घोटाला, बलपूर्वक दूसरों के जमीन-धन पर कब्जा)|
अब जब खुद की पार्टी में ही कालिख पुते लोग है तो जनता के सामने किस मुंह से आये??
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अब इस देश को जरूरत है, एक आमूलचूल परिवर्तन की| एक नये संविधान की, एक नये नायक की, एक नयी क्रान्ति की ||||
इतिहास गवाह है कि जब-जब भी किसी देश में एक बडा परिवर्तन आया है, उसके पीछे युवाओं का ही बडा योगदान रहा है|
बस अब और ज्यादा नहीं लिखुंगा, आज के लिये इतना ही ||
___________ "एक भारतीय"
